मैं शिकायत भी करता हूँ ,
मैं संतोष भी करता हूँ ,
बड़ा छलिया हूँ
अनेको रूप भरता हूँ ।
मैं खुद ही खुद को मिटाने की भी बात करता हूँ ,
लेकिन फिर भी ताज्जुब है कभी भी मैं न मरता हूँ।
मैं खुद को कहीं अहंकारी
मैं खुद को कहीं निरहंकारी कहलाता हूँ।
क्योंकि कहीं न कहीं मुझे पता है नाम बिना पहचान नही पाता हूँ ।
इस पहचान के लिऐ मैंने कभी हजारों कत्ल किये ,
इस पहचान के लिये , कभी मैंने बलिदान भी किये ।
मुझे खुद की पहचान आज भी बनानी है ।
मैं ऐसा रक्तबीज हूँ जिसने हार कभी न मानी है ।