बुधवार, 14 मई 2014

प्रेम का अर्थ

अमृत जहर हो सकता है, अगर नासमझ के हाथ में पड़ जाए। जहर अमृत हो जाता है, अगर समझदार के हाथ में पड़ जाए। तो न तो अमृत अमृत है, न जहर जहर। असली बात है, तुम पर निर्भर। किसी वैद्य के हाथ में पड़ कर जहर औषधि हो जाता है, मरते को बचा लेता है। और कोई नासमझ इतना अमृत पी सकता है कि पीकर ही मर जाए। जरूरत से ज्यादा पी जाए! सीमा के बाहर पी जाए!

मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, शायद तुम उस प्रेम की बात नहीं कर रहे हो। तुम किसी और ही प्रेम की बात कर रहे हो। मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूं जो प्रार्थना की तरफ ले जाता है। तुम उस प्रेम की बात कर रहे हो जो वासना की तरफ ले जाता है। और ये यात्राएं अलग-अलग हैं। ये यात्राएं विपरीत हैं।

प्रेम नीचे गिरे तो वासना बनता है; ऊपर उठे तो प्रार्थना बनता है। प्रेम उतार पर हो तो वासना; चढ़ाव पर हो तो प्रार्थना। प्रेम पहाड़ से लुढ़कने लगे पत्थर की भांति, तो वासना। और प्रेम को पंख लग जाएं और उड़ चले सूरज की तरफ, तो प्रार्थना।
नीचे उतरना तो दुखपूर्ण है। इसलिए तो सारे धर्म कहते हैं कि नरक नीचे है। नीचे का मतलब भौगोलिक मत समझना कि जमीन में गङ्ढा खोदते चले जाएंगे, खोदते चले जाएंगे, खोदते चले जाएंगे, एक दिन नरक मिलेगा। नरक नहीं मिलेगा, अमरीका पहुंच जाओगे। और अमरीका के लोग अगर खोदते चले आएं, तो भारत-भूमि में, इस पुण्य भूमि में आ जाएंगे! वे भी यही सोचते हैं कि नरक नीचे है। दुनिया के सारे लोग सोचते हैं कि नरक नीचे है। नीचे की बात भौगोलिक नहीं है; नीचे की बात बड़ी गहरी है; उसका संदर्भ समझो। जब भी जीवन-चेतना नीचे की तरफ उतरती है, तो नरक में ले जाती है।

और यही अर्थ है स्वर्ग के ऊपर होने का। ऊपर होने का ऐसा अर्थ नहीं कि चले बैठ कर अंतरिक्ष यान में, और एक दिन स्वर्ग पहुंच जाएंगे! ऐसी भ्रांति रही होगी यूरी गागरिन को। क्योंकि उसने लौट कर जो पहली बात कही वह यह कही कि मैं चक्कर लगा आया चांद का, अंतरिक्ष की यात्रा कर आया, परमात्मा कहीं मिला नहीं। स्वर्ग इत्यादि कहीं भी नहीं है!
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स्त्री पुरुष के लिए पहेली

पुरुष के लिए स्त्री पहेली रही है। स्त्री के लिए पुरुष पहेली है। स्त्री सोच ही नहीं पाती कि तुम किसलिए चांद पर जा रहे हो? घर काफी नहीं? वही तो यशोधरा ने बुद्ध से पूछा, जब वे लौटकर आए, कि जो तुमने वहां पाया वह यहां नहीं मिल सकता था? ऐसा जंगल भागने की क्या पड़ी थी? यह घर क्या बुरा था? अगर शांत ही होना था तो जितनी सुविधा यहां थी, इतनी वहां जंगल में तो नहीं थी। तुमने कहा होता, हम तुम्हें बाधा न देते। हम तुम्हें एकांत में छोड़ देते। हम सारी सुविधा कर देते कि तुम्हें जरा भी बाधा न पड़े। लेकिन बुद्ध को अगर यशोधरा ऐसा इंतजाम कर देती कि जरा भी बाधा न पड़े--यशोधरा अपनी छाया भी न डालती बुद्ध पर--तो भी बुद्ध बंधे-बंधे अनुभव करते। क्योंकि वे अनजाने तार यशोधरा के चारों तरफ फैलते जाते, और भी ज्यादा फैल जाते। वह छाया की तरह चारों तरफ अपना जाल बुन देती। घबड़ाकर भाग गए।

जो भी कभी भागा है जंगल की तरफ, प्रेम से घबड़ाकर भागा है। और क्या घबड़ाहट है? कहीं प्रेम बांध न ले। कहीं प्रेम आसक्ति न बन जाए। कहीं प्रेम राग न हो जाए। स्त्रियों को जंगल की तरफ भागते नहीं देखा गया। क्योंकि स्त्री को समझ में ही नहीं आता, भागना कहां है? डूबना है। डूबना यहीं हो सकता है। और स्त्री ने बहुत चिंता नहीं की परमात्मा की जो आकाश में है, उसने तो उसी परमात्मा की चिंता की जो निकट और पास है।

स्त्री को रस नहीं मालूम होता कि चीन में क्या हो रहा है? उसका रस होता है, पड़ोसी के घर में क्या हो रहा है? पास। तुम्हें कई दफा लगता भी है--पति को--कि ये भी क्या फिजूल की बातों में पड़ी है कि पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ चली गयी, कि पड़ोसी के घर बच्चा पैदा हुआ, कि पड़ोसी नयी कार खरीद लाया--ये भी क्या फिजूल की बातें हैं? वियतनाम है, इजराइल है, बड़े सवाल दुनिया के सामने हैं। तू नासमझ! पड़ोसी के घर बच्चा हुआ, यह भी कोई बात है? लाखों लोग मर रहे हैं युद्ध में। इस एक बच्चे के होने से क्या होता है?

स्त्री को समझ में नहीं आता कि पड़ोसी के घर बच्चा पैदा होता है, इतनी बड़ी घटना घटती है--एक नया जीवन अवतीर्ण हुआ; कि पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ चली गयी--एक नए प्रेम का आविर्भाव हुआ; तुम्हें इसका कुछ रस ही नहीं है! इजराइल से लेना-देना क्या है? इजराइल से फासला इतना है कि स्त्री के मन पर उसका कोई अंकुरण नहीं होता, कोई छाप नहीं पड़ती। दूरी इतनी है।
स्त्री परमात्मा जो बहुत दूर है आकाश में उसमें उत्सुक नहीं है। परमात्मा जो बहुत पास है, बेटे में है, पति में है, परिवार में है, पड़ोसी में है, उसमें उसका रस है। क्योंकि दूर जाने में उसकी आकांक्षा नहीं है। यहीं डूब जाना है।......

सुरति परमात्मा की



'स्तुति करने वाले उसकी स्तुति करते हैं, लेकिन उन्हें उसकी सुरति नहीं मिली।'
सुरति शब्द बड़ा कीमती है। यह नानक के जीवन-साधना का सार शब्द है। और सभी संत सुरति में लीन हो जाते हैं। सुरति शब्द आता है बुद्ध से। बुद्ध स्मृति शब्द का उपयोग करते हैं--उसका स्मरण। जिसको गुरजिएफ ने सेल्फ रिमेंबरिंग कहा है--आत्मस्मरण। जिसको कृष्णमूर्ति अवेयरनेस कहते हैं--एक जागरूक भाव। उसको नानक सुरति कहते हैं।

सुरति बहुत बारीक... शब्द है। और समझने के लिए थोड़े से परोक्ष में से उतरना जरूरी है। एक मां खाना बना रही है। वह खाना बनाती रहती है, उसका छोटा सा बच्चा खेल रहा है आस-पास। वह खाना बना रही है। जहां तक ऊपर से देखो, उसका सारा ध्यान खाना बनाने में लगा है। लेकिन उसकी सुरति बच्चे में लगी है। वह बच्चा कहीं गिर न जाए! वह कहीं सीढ़ी के करीब तो नहीं पहुंच गया? वह कहीं झूले से नीचे तो नहीं उतर गया? उसने कोई चीज हाथ में तो नहीं ले ली, जो नहीं खानी है? काम में लगी है। लेकिन सारे काम में ओतप्रोत एक स्मरण है, वह बच्चे का है।

मां रात सोती है। आकाश में बादल गरजें, बिजली कड़के, तो भी नींद नहीं टूटती उसकी। और बच्चा थोड़ा सा कुनमुनाए, और उसकी नींद टूट जाती है। तूफान गुजरता रहे घर के ऊपर से, मां गहरी नींद में पड़ी रहती है। लेकिन बच्चा थोड़ी सी करवट ले, तो जल्दी उसका हाथ उठ जाता है। नींद में भी सुरति है। स्मरण बच्चे का बना है।
सुरति का अर्थ है, एक सातत्य स्मरण का--मनकों में धागे की तरह। सब तुम करते रहो संसार में, सुरति उसकी बनी रहे। उठो, बैठो, जो करने योग्य है करो। भागने से तो कुछ होगा नहीं। दूकान पर जाओगे, दफ्तर में जाओगे, फैक्टरी में काम करोगे, गङ्ढा खोदोगे, धन भी कमाना होगा, बच्चों की चिंता भी लेनी होगी, सारा जाल है। इस सारे जाल के बीच, लेकिन स्मरण उसका बना रहे। यह सब ऊपर-ऊपर हो, भीतर-भीतर वह हो। यह सब तुम्हारे बाहर-बाहर रहे, वह तुम्हारे भीतर रहे। नाता उससे जुड़ा रहे।

इसलिए नानक कहते हैं, संसार छोड़ कर जाने की कोई भी जरूरत नहीं। सुरति को पा लो कि तुम संन्यासी हो गए। सुरति सम्हल गयी कि सब सम्हल गया। और तुम जंगल भी भाग जाओगे तो क्या फायदा है, अगर सुरति संसार की बनी रही!
और अक्सर ऐसा होता है। लोग जंगल में बैठ जाते हैं जा कर, फिर यहां की याद करते हैं। और मन का तो यह ढंग ही है कि तुम जहां होते हो, वहां की फिक्र ही नहीं करता। जहां नहीं होते, वहां की फिक्र करता है। जब तुम यहां हो तब तुम्हें लगता है,
हिमालय में बड़ा आनंद होगा। फिर तुम हिमालय पहुंच गए, तब तुम सोचते हो, पता नहीं उधर बहुत आनंद आ रहा हो, पूना में। और पता नहीं हम भटक गए, सारी दुनिया तो वहीं है। सभी तो गलत नहीं हो सकते। अब हम यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हैं झाड़ के नीचे? वहां भी तुम रुपए गिनोगे। वहां भी तुम हिसाब लगाओगे। वहां भी पत्नी और बच्चों के चेहरे तुम्हारे आसपास घूमेंगे। तुम रहोगे हिमालय में, लेकिन सुरति तो तुम्हारी यहां लगी रहेगी।
 नानक कहते हैं, रहो तुम कहीं भी, सुरति परमात्मा में हो।

अमीर की पीड़ा

अमीर आदमी पहली दफा पीड़ित होता है। गरीब की पीड़ा तो हजार बहानों में छिप जाती है। वह कहता है, मकान होता तो सब ठीक हो जाता, मकान नहीं है। वर्षा में छप्पर में छेद हैं, पानी गिर रहा है, छप्पर ठीक होता तो सब ठीक हो जाता। उसे पता नहीं कि ठीक छप्पर बहुतों के हैं, कुछ भी ठीक नहीं हुआ है। उसके पास कम से कम एक बहाना तो है। अमीर के पास वह बहाना भी न रहा। उस हालत में अमीर और गरीब हो जाता है। उसके पास बहाना तक करने को नहीं है, कि वह किसी चीज पर अपनी पीड़ा को टांग दे और कह दे कि इसके कारण पीड़ा है। अकारण पीड़ा है।

उस अकारण पीड़ा से ही धर्म का जन्म है।

पीड़ा क्या है? पीड़ा ऐसी ही है जैसे कोई स्त्री गर्भवती हो, नौ महीने पूरे हो गए हों, और बच्चा पैदा न होता हो। बोझ हो गया। बच्चा पैदा होना चाहिए। कितने जन्मों से तुम परमात्मा को गर्भ में लिए चल रहे हो। वह पैदा नहीं हो रहा है, यही पीड़ा है। ठीक पीड़ा को पहचान लेना रास्ते पर अनिवार्य कदम है। जब तक तुम गलत चीजों को पीड़ा समझते रहोगे और उनको ठीक करने में लगे रहोगे, तभी तक तुम संसारी हो। जिस दिन तुम्हें ठीक पीड़ा समझ में आ जाएगी कि यह रही पीड़ा, हाथ पड़ जाएगा पीड़ा पर, तब तुम पाओगे कि पीड़ा यही है--
लो हम बताएं गुंचा और गुल में है फर्क क्या
एक बात है कही हुई एक बेकही हुई

जब तक तुम जिस गीत को अपने भीतर लिए चल रहे हो सदियों-सदियों से, जन्मों-जन्मों से, वह गीत गाया न जा सके; जिस नाच को तुम अपने पैरों में सम्हाले चल रहे हो, जब तक वह नाच घूंघर बांधकर नाच न उठे; तब तक तुम पीड़ित रहोगे। उस नाच को हमने परमात्मा कहा है। उस गीत के फूट जाने को हमने निर्वाण कहा है। उस फूल के खिल जाने को हमने कैवल्य कहा है।
तुम्हारी कली फूल बन जाए--मुक्ति, मोक्ष, मंजिल आ गयी।

मनुष्य बांस का एक टुकड़ा

मेरे गीत शोर थे केवल तुमसे लगी लगन के पहले

जैसे पत्थर-भर होती है हर प्रतिमा पूजन के पहले


स्वर थे लेकिन दर्द नहीं था

मेरे छंद सुवासित कब थे

आंसू के छींटों से पहले

जीवन से उद्भासित कब थे

मुझमें संभावना नहीं थी दर्दों के दोहन के पहले

जैसे अमृत प्राप्य नहीं था सागर के मंथन के पहले


अपने में सौंदर्य समेटे

होने को तो सृष्टि यही थी

लेकिन जो सुंदरता देखे

दृग में ऐसी दृष्टि नहीं थी

स्वच्छ नहीं थी नजर तुम्हारे रूपायित दर्शन के पहले

जैसे कांच मात्र रहता है कांच सदा दर्पण के पहले


तुमसे जोड़े सूत्र स्नेह के

जुड़ बैठा मुझसे जग सारा

सारी दुनिया का हो बैठा

मैं जिस दिन हो गया तुम्हारा

मैं था बहुत अपरिचित निज से तुमसे परिचय-क्षण के पहले

जैसे सीप न जन्मे मोती स्वाति-नखत जल-कण के पहले


कोकिल जितना घायल होता

उतनी मधुर कुहुक देता है

जितना धुंधवाता है चंदन

उतनी अधिक महक देता है

मैं तो केवल तन ही तन था मुझमें जागे मन के पहले

जैसे सिर्फ बांस का टुकड़ा है बंसी-वादन के पहले



मनुष्य तो बांस का एक टुकड़ा है--बस, बांस का! बांस की एक पोली पोंगरी । प्रभु के ओंठों से लग जाए तो अभिप्राय का जन्म होता है, अर्थ का जन्म होता है, महिमा प्रगट होती है। संगीत छिपा पड़ा है बांस के टुकड़े में, मगर उसके जादुई स्पर्श के बिना प्रकट न होगा। पत्थर की मूर्ति भी पूजा से भरे हृदय के समक्ष सप्राण हो जाती है। प्रेम से भरी आंखें प्रकृति में ही परमात्मा का अनुभव कर लेती हैं।
सारी बात परमात्मा से जुड़ने की है। उससे बिना जुड़े सब है और कुछ भी नहीं है। वीणा पड़ी रहेगी और छंद पैदा न होंगे। हृदय तो रहेगा, श्वास भी चलेगी, लेकिन प्रेम की रसधार न बहेगी। वृक्ष भी होंगे लेकिन फूल न खिलेंगे; जीवन में फल न आएंगे। परमात्मा से जुड़े बिना कोई परितृप्ति नहीं है। परमात्मा से जुड़े बिना लंबी-लंबी यात्रा है, बड़ी लंबी अथक यात्रा है; लेकिन मरुस्थल और मरुस्थल! मरूद्यानों का कोई पता नहीं चलता।
 ~~~~ओशो ~~~