'स्तुति करने वाले उसकी स्तुति करते हैं, लेकिन उन्हें उसकी सुरति नहीं मिली।'
सुरति शब्द बड़ा कीमती है। यह नानक के जीवन-साधना का सार शब्द है। और सभी संत सुरति में लीन हो जाते हैं। सुरति शब्द आता है बुद्ध से। बुद्ध स्मृति शब्द का उपयोग करते हैं--उसका स्मरण। जिसको गुरजिएफ ने सेल्फ रिमेंबरिंग कहा है--आत्मस्मरण। जिसको कृष्णमूर्ति अवेयरनेस कहते हैं--एक जागरूक भाव। उसको नानक सुरति कहते हैं।
सुरति बहुत बारीक... शब्द है। और समझने के लिए थोड़े से परोक्ष में से उतरना जरूरी है। एक मां खाना बना रही है। वह खाना बनाती रहती है, उसका छोटा सा बच्चा खेल रहा है आस-पास। वह खाना बना रही है। जहां तक ऊपर से देखो, उसका सारा ध्यान खाना बनाने में लगा है। लेकिन उसकी सुरति बच्चे में लगी है। वह बच्चा कहीं गिर न जाए! वह कहीं सीढ़ी के करीब तो नहीं पहुंच गया? वह कहीं झूले से नीचे तो नहीं उतर गया? उसने कोई चीज हाथ में तो नहीं ले ली, जो नहीं खानी है? काम में लगी है। लेकिन सारे काम में ओतप्रोत एक स्मरण है, वह बच्चे का है।
मां रात सोती है। आकाश में बादल गरजें, बिजली कड़के, तो भी नींद नहीं टूटती उसकी। और बच्चा थोड़ा सा कुनमुनाए, और उसकी नींद टूट जाती है। तूफान गुजरता रहे घर के ऊपर से, मां गहरी नींद में पड़ी रहती है। लेकिन बच्चा थोड़ी सी करवट ले, तो जल्दी उसका हाथ उठ जाता है। नींद में भी सुरति है। स्मरण बच्चे का बना है।
सुरति का अर्थ है, एक सातत्य स्मरण का--मनकों में धागे की तरह। सब तुम करते रहो संसार में, सुरति उसकी बनी रहे। उठो, बैठो, जो करने योग्य है करो। भागने से तो कुछ होगा नहीं। दूकान पर जाओगे, दफ्तर में जाओगे, फैक्टरी में काम करोगे, गङ्ढा खोदोगे, धन भी कमाना होगा, बच्चों की चिंता भी लेनी होगी, सारा जाल है। इस सारे जाल के बीच, लेकिन स्मरण उसका बना रहे। यह सब ऊपर-ऊपर हो, भीतर-भीतर वह हो। यह सब तुम्हारे बाहर-बाहर रहे, वह तुम्हारे भीतर रहे। नाता उससे जुड़ा रहे।
इसलिए नानक कहते हैं, संसार छोड़ कर जाने की कोई भी जरूरत नहीं। सुरति को पा लो कि तुम संन्यासी हो गए। सुरति सम्हल गयी कि सब सम्हल गया। और तुम जंगल भी भाग जाओगे तो क्या फायदा है, अगर सुरति संसार की बनी रही!
और अक्सर ऐसा होता है। लोग जंगल में बैठ जाते हैं जा कर, फिर यहां की याद करते हैं। और मन का तो यह ढंग ही है कि तुम जहां होते हो, वहां की फिक्र ही नहीं करता। जहां नहीं होते, वहां की फिक्र करता है। जब तुम यहां हो तब तुम्हें लगता है,
हिमालय में बड़ा आनंद होगा। फिर तुम हिमालय पहुंच गए, तब तुम सोचते हो, पता नहीं उधर बहुत आनंद आ रहा हो, पूना में। और पता नहीं हम भटक गए, सारी दुनिया तो वहीं है। सभी तो गलत नहीं हो सकते। अब हम यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हैं झाड़ के नीचे? वहां भी तुम रुपए गिनोगे। वहां भी तुम हिसाब लगाओगे। वहां भी पत्नी और बच्चों के चेहरे तुम्हारे आसपास घूमेंगे। तुम रहोगे हिमालय में, लेकिन सुरति तो तुम्हारी यहां लगी रहेगी।
नानक कहते हैं, रहो तुम कहीं भी, सुरति परमात्मा में हो।
सुरति शब्द बड़ा कीमती है। यह नानक के जीवन-साधना का सार शब्द है। और सभी संत सुरति में लीन हो जाते हैं। सुरति शब्द आता है बुद्ध से। बुद्ध स्मृति शब्द का उपयोग करते हैं--उसका स्मरण। जिसको गुरजिएफ ने सेल्फ रिमेंबरिंग कहा है--आत्मस्मरण। जिसको कृष्णमूर्ति अवेयरनेस कहते हैं--एक जागरूक भाव। उसको नानक सुरति कहते हैं।
सुरति बहुत बारीक... शब्द है। और समझने के लिए थोड़े से परोक्ष में से उतरना जरूरी है। एक मां खाना बना रही है। वह खाना बनाती रहती है, उसका छोटा सा बच्चा खेल रहा है आस-पास। वह खाना बना रही है। जहां तक ऊपर से देखो, उसका सारा ध्यान खाना बनाने में लगा है। लेकिन उसकी सुरति बच्चे में लगी है। वह बच्चा कहीं गिर न जाए! वह कहीं सीढ़ी के करीब तो नहीं पहुंच गया? वह कहीं झूले से नीचे तो नहीं उतर गया? उसने कोई चीज हाथ में तो नहीं ले ली, जो नहीं खानी है? काम में लगी है। लेकिन सारे काम में ओतप्रोत एक स्मरण है, वह बच्चे का है।
मां रात सोती है। आकाश में बादल गरजें, बिजली कड़के, तो भी नींद नहीं टूटती उसकी। और बच्चा थोड़ा सा कुनमुनाए, और उसकी नींद टूट जाती है। तूफान गुजरता रहे घर के ऊपर से, मां गहरी नींद में पड़ी रहती है। लेकिन बच्चा थोड़ी सी करवट ले, तो जल्दी उसका हाथ उठ जाता है। नींद में भी सुरति है। स्मरण बच्चे का बना है।
सुरति का अर्थ है, एक सातत्य स्मरण का--मनकों में धागे की तरह। सब तुम करते रहो संसार में, सुरति उसकी बनी रहे। उठो, बैठो, जो करने योग्य है करो। भागने से तो कुछ होगा नहीं। दूकान पर जाओगे, दफ्तर में जाओगे, फैक्टरी में काम करोगे, गङ्ढा खोदोगे, धन भी कमाना होगा, बच्चों की चिंता भी लेनी होगी, सारा जाल है। इस सारे जाल के बीच, लेकिन स्मरण उसका बना रहे। यह सब ऊपर-ऊपर हो, भीतर-भीतर वह हो। यह सब तुम्हारे बाहर-बाहर रहे, वह तुम्हारे भीतर रहे। नाता उससे जुड़ा रहे।
इसलिए नानक कहते हैं, संसार छोड़ कर जाने की कोई भी जरूरत नहीं। सुरति को पा लो कि तुम संन्यासी हो गए। सुरति सम्हल गयी कि सब सम्हल गया। और तुम जंगल भी भाग जाओगे तो क्या फायदा है, अगर सुरति संसार की बनी रही!
और अक्सर ऐसा होता है। लोग जंगल में बैठ जाते हैं जा कर, फिर यहां की याद करते हैं। और मन का तो यह ढंग ही है कि तुम जहां होते हो, वहां की फिक्र ही नहीं करता। जहां नहीं होते, वहां की फिक्र करता है। जब तुम यहां हो तब तुम्हें लगता है,
हिमालय में बड़ा आनंद होगा। फिर तुम हिमालय पहुंच गए, तब तुम सोचते हो, पता नहीं उधर बहुत आनंद आ रहा हो, पूना में। और पता नहीं हम भटक गए, सारी दुनिया तो वहीं है। सभी तो गलत नहीं हो सकते। अब हम यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हैं झाड़ के नीचे? वहां भी तुम रुपए गिनोगे। वहां भी तुम हिसाब लगाओगे। वहां भी पत्नी और बच्चों के चेहरे तुम्हारे आसपास घूमेंगे। तुम रहोगे हिमालय में, लेकिन सुरति तो तुम्हारी यहां लगी रहेगी।
नानक कहते हैं, रहो तुम कहीं भी, सुरति परमात्मा में हो।

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