बुधवार, 14 मई 2014

मनुष्य बांस का एक टुकड़ा

मेरे गीत शोर थे केवल तुमसे लगी लगन के पहले

जैसे पत्थर-भर होती है हर प्रतिमा पूजन के पहले


स्वर थे लेकिन दर्द नहीं था

मेरे छंद सुवासित कब थे

आंसू के छींटों से पहले

जीवन से उद्भासित कब थे

मुझमें संभावना नहीं थी दर्दों के दोहन के पहले

जैसे अमृत प्राप्य नहीं था सागर के मंथन के पहले


अपने में सौंदर्य समेटे

होने को तो सृष्टि यही थी

लेकिन जो सुंदरता देखे

दृग में ऐसी दृष्टि नहीं थी

स्वच्छ नहीं थी नजर तुम्हारे रूपायित दर्शन के पहले

जैसे कांच मात्र रहता है कांच सदा दर्पण के पहले


तुमसे जोड़े सूत्र स्नेह के

जुड़ बैठा मुझसे जग सारा

सारी दुनिया का हो बैठा

मैं जिस दिन हो गया तुम्हारा

मैं था बहुत अपरिचित निज से तुमसे परिचय-क्षण के पहले

जैसे सीप न जन्मे मोती स्वाति-नखत जल-कण के पहले


कोकिल जितना घायल होता

उतनी मधुर कुहुक देता है

जितना धुंधवाता है चंदन

उतनी अधिक महक देता है

मैं तो केवल तन ही तन था मुझमें जागे मन के पहले

जैसे सिर्फ बांस का टुकड़ा है बंसी-वादन के पहले



मनुष्य तो बांस का एक टुकड़ा है--बस, बांस का! बांस की एक पोली पोंगरी । प्रभु के ओंठों से लग जाए तो अभिप्राय का जन्म होता है, अर्थ का जन्म होता है, महिमा प्रगट होती है। संगीत छिपा पड़ा है बांस के टुकड़े में, मगर उसके जादुई स्पर्श के बिना प्रकट न होगा। पत्थर की मूर्ति भी पूजा से भरे हृदय के समक्ष सप्राण हो जाती है। प्रेम से भरी आंखें प्रकृति में ही परमात्मा का अनुभव कर लेती हैं।
सारी बात परमात्मा से जुड़ने की है। उससे बिना जुड़े सब है और कुछ भी नहीं है। वीणा पड़ी रहेगी और छंद पैदा न होंगे। हृदय तो रहेगा, श्वास भी चलेगी, लेकिन प्रेम की रसधार न बहेगी। वृक्ष भी होंगे लेकिन फूल न खिलेंगे; जीवन में फल न आएंगे। परमात्मा से जुड़े बिना कोई परितृप्ति नहीं है। परमात्मा से जुड़े बिना लंबी-लंबी यात्रा है, बड़ी लंबी अथक यात्रा है; लेकिन मरुस्थल और मरुस्थल! मरूद्यानों का कोई पता नहीं चलता।
 ~~~~ओशो ~~~

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